NCERT Class 10 Hindi Chapter 1 Sparsh Kabhi Sakhi Exercise Solutions Part 3 Explained in Detailed

हिन्दी (स्पर्श) (पाठ 1) (कबीर-साखी) (कक्षा 10) प्रश्न अभ्यास Part 3

भाव स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 1:

बिरह भुवगंम तन बसै, मंत्र ल लागै कोई।

उत्तर 1:

कबीरदास जी विरह अर्थात दुख के महत्व को समझाते हुए कहा है कि जब दुखी रूपी सापं शरीर में अपना निवास कर लेता है तब कोई भी मंत्र काम नहीं आता है। क्योंकि बहुत दुख होने के बाद ही हमें ईश्वर के प्रेम की प्राप्ति होती हैं। अर्थात शरीर में अनेक कष्ट होने के बाद ही हमें भगवान के प्रेम की प्राप्ति होती हैं।

प्रश्न 2 :

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।

उत्तर 2 :

कवि कहते है कि जिस प्रकार हिरण की नाभि में कस्तुरी होती है और वह हिरण कस्तुरी की खुशबू पाने के लिए इधर-उधर भटकता रहता है ठीक उसी प्रकार व्यक्ति के अंदर ईश्वर होते हुए भी वह उसे पाने के लिए हर जगह भटकता रहता है। अर्थात मनुष्य में भगवान का ज्ञान न होने से वह भगवान को खोजता रहता है।

प्रश्न 3 :

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।

उत्तर 3 :

कवि कहता है जब तक हमारे अंदर या भीतर मैं या अंह का भाव रहेगा तब तक हमें भगवान किसी भी तरह नहीं मिल सकते है। जैसे ही हमारे अंदर अंह का भाव समाप्त हो जाएगा हमें ईश्वर की प्राप्ति हो जाएगी। अर्थात हमें भगवान का आर्शीवाद मिल जाएगा। उसकी कृपा हमारे ऊपर बन जाएगी।

प्रश्न 4 :

पोथी पढि पढि जब मुवा, पंडित भया न कोई।

उत्तर 4 :

कवि कबीरदास जी कहते है कि बहुत सारी पुस्तके पढ़कर लोग अपने आप को बहुत ज्ञानी समझते हैं अर्थात स्वयं को पंडति समझने लगते हैं, लेकिन जब तक भगवान के प्रति उनके मन में प्रेम और भक्ति का भाव नहीं जागेगा तब तक वह पूर्ण रूप से ज्ञानी नहीं बन सकता हैं अर्थात वह हमेशा अज्ञानी ही रहेगा।

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