कारक(For CBSE, ICSE, IAS, NET, NRA 2022)

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कारक परिभाषा- कारक वह व्याकरणिक कोटि है, जो वाक्य में आए संज्ञा आदि शब्दों का क्रिया के साथ संबंध बताती है।

कारकों के भेद-

• कर्ता

• कर्म

• करण

• संप्रदान

• अपादान

• संबंध

• अधिकरण कारक

• संबोधन कारक

कर्ता कारक- ′ कर्ता ′ शब्द का अर्थ है- ′ करने वाला ′ । शायद आप जानते हों ईश्वर को ′ कर्ता ′ कहा जाता है। क्यों? क्योंकि इस ब्रह्यांड में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसको करने वाला ईश्वर है।

कर्म कारक- वाक्य में कर्म वह संज्ञा है जिस पर क्रिया का फल पड़ता है। सकर्मक क्रिया हमेशा कर्म की अपेक्षा रखती है। कर्म के बिना क्रिया संपन्न नहीं हो पाती जैसे -वह खा रहा है। वाक्य अधूरा-सा लगता है लेकिन यदि आप कहते हैं ‘वह आम खा रहा है’ तो आम संज्ञा यहाँ ‘कर्म’ का कार्य कर रही है।

करण कारक- ‘करण’ का अर्थ है-साधन। करण कारक का चिन्ह से परसर्ग है। वाक्य की क्रिया को संपन्न करने के लिए जिस निर्जीव संज्ञा का प्रयोग साधन के रूप में होता है वह संज्ञा करण कारक में कही जाती है

जैसे-

• शीला ने पेंसिल से चित्र बनाया।

• वह चाकू से सेब काट रही है।

संप्रदान कारक- जिस संज्ञा के लिए या जिस प्रयोजन के हेतु की क्रिया घटित होती है वह संज्ञा संप्रदान कारक में कही जाती है।

कर्म और संप्रदान कारक में अंतर-कर्म कारक और संप्रदान कारक दोनो ‘में’ को विभक्ति का प्रयोग होता है। कर्म कारक में जिस शब्द के साथ ‘को’ जुड़ा होता है, उस पर क्रिया का फल पड़ता है। जैसे- सुरेन्द्र ने महेन्द्र को पढ़ाया

संप्रदान कारक के चिन्ह को ‘का’ अर्थ के लिए ‘या’ के वास्ते होता है। संप्रदान कारक में किसी को कुछ देने या किसी के लिए कुछ काम करने का बोध होता है। संप्रदान कारक में देने या उपकार करने का भाव मुख्य होता है।

जैसे-

• गरीबो को भोजन और वस्त्र दे दो।

• यहां पढ़ने को पुस्तकें नहीं मिलतीं।

विशेष- यदि वाक्य में कर्म कारक भी हो और संप्रदान भी, तो कर्म कारक ‘के’ साथ ‘को’ नहीं लगता।

अपादान कारक- जब वाक्य की किसी संज्ञा से क्रिया के दव्ारा अलग होने, तुलना होने या दूरी होने का भाव प्रकट होता है वहाँ अपादान कारक होता है; जैसे- बच्चा घर से निकला। इस वाक्य में निकलना क्रिया, घर संज्ञा से बच्चे को अलग होना दिखा रही है। यहाँ घर संज्ञा अपादान कारक में होगी।

करण और अपादान में अंतर- ‘करण’ तथा ‘अपादान’ दोनों कारकों का विभक्ति चिन्ह से है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से दोनों में भेद है। करण कारक में से सहायक साधन का सूचक है जबकि अपादान कारक मेे से अलगाव का; जैसे चोर सिपाही से डरता है। वह कल आगरा से लौटा है। करण कारक में - ‘से’ सहायक साधन का सूचक है, जबकि अपादन कारक ‘में’ अलगाव का।

संबंध कारक- जहाँ संज्ञा या सर्वनाम से किसी अन्य संज्ञा का संबंध दिखाया जाए, वहाँ संबंध कारक होता है। इसमें संबंध बताने वाले चिन्ह-का, के, की तथा सर्वनामों में रा, रे, री लगते हैं।

जैसे-

• यह शीला का घर है।

• वह मदन की दुकान है।

• स्याही की दवात किसकी है

अधिकरण कारक- क्रिया जिस स्थान या समय पर घटित होती है व्याकरण में वह स्थान या समय संबंधी आधार अधिकरण कहा जाता है। जैसे वह कमल आगरा से लौटा है। अधिकरण के सूचक चिन्ह हैं- में, पर, के, पहले आदि

जैसे-

• किताब मेज़ पर रख दो

• छत पर कौन हैं?

• बिल्ली रसोई में है।

संबोधन- जब किसी संज्ञा को संबोधित किया जाता है या उसका ध्यान आकर्षित किया जाता है, तब इस कारक का प्रयोग होता है। संबोधन संज्ञा शब्द के पहले प्राय: विस्मयादिबोधक अव्यय हे, रे, अरे आदि लगते हैं जैसे- हे लड़के! इधर आओ, अरे भाई! झूठ मत बोलो।

परसर्ग-संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया से संबंध दर्शाने वाले चिन्ह ‘परसर्ग’ कहलाते हैं।

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