क्रिया

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क्रिया की परिभाषा-जिन शब्दों से किसी काम का करना या होना पाया जाता है, उन शब्दों को क्रिया कहते हैं। अर्थात्‌ ’क्रिया’ वे शब्द (पद) हैं जिनसे किसी कार्य के होने या किए जाने का, किसी घटना या प्रक्रिया के घटित होने का, या किसी वस्तु या व्यक्ति की अवस्था या स्थिति का बोध होता है।

जैसे-

• मोहन आता है।

• मोहन गया।

• श्यामा गाती है।

इन वाक्यों में आता है, गया तथा गाती है, ये क्रियाएँ हैं।

क्रिया के भेद- क्रिया के मुख्य दो भेद होते हैं-

कर्म के आधार पर क्रिया के भेद-

(क) सकर्मक क्रिया-जिस वाक्य में कर्मकारक तथा क्रिया दोनों रहते हैं उस वाक्य की क्रिया सकर्मक (कर्म सहित) क्रिया कहलाती है। इसलिए विदव्ानों ने सकर्मक क्रिया की परिभाषा इस प्रकार की है- ”जिस क्रिया के व्यापार का फल कर्ता से निकलकर किसी अन्य वस्तु अथवा व्यक्ति पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहतें हैं। इसके दो भेद होते हैं-

1. पूर्ण सकर्मक- वे सकर्मक क्रियाएं जो अपने अर्थ को स्वत: पूरी तरह से व्यक्त कर पाने में समर्थ हैं, पूर्ण सकर्मक कही जाती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं-

• (अ) एककर्मक

• (ब) द्विकर्मक।

(अ) एककर्मक (पूर्ण सकर्मक) क्रिया- वे सकर्मक्र क्रियाएँ जो केवल एक कर्म लेती हैं, एककर्मक कही जाती हैं; जैसे -

• शीला गाना गा रही है।

• मेहन अखबार पढ़ रहा है।

• वे अमरुद खा रहे हैं।

यहाँ गाना, अखबार, व अमरुद कर्म हैं, जो क्रिया पर ’क्या’ के प्रश्न के उत्तर में निर्जीव संज्ञा के रूप में प्राप्त होते हैं। इनको प्रत्यक्ष कर्म कहा जाता है।

(ब) द्विकर्मक (पूर्ण सकर्मक) क्रिया- कुछ पूर्ण सकर्मक क्रियाएँ ऐसी भी हैं, जो दो कर्म लेती हैं; जैसे- भेजना, लेना, देना, बताना, खरीदना आदि द्‌वकर्मक क्रियाएँ हैं। जैसे -

• मैंने शीला को किताब दी।

• मोहन ने शयाम को गाड़ी बेच दी।

• राम ने शीला को किताब दी।

• मैंने माँ को पत्र भेजा।

उपर्युक्त वाक्यों में क्रिया पर ’ क्या’ के उत्तर में प्राप्त संज्ञा ’प्रत्यक्ष कर्म’ कही जाती है तथा ’किसे/किसको’ के उत्तर में प्राप्त सजीव संज्ञा ’अप्रत्यक्ष कर्म’ कहलाती है।

2. अपूर्ण सकर्मक क्रिया- जिन सकर्मक क्रियाओं में कर्म के रहते हुए भी अर्थ को पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता, वे अपूर्ण सकर्मक कही जाती हैं। अर्थ की पूर्णता के लिए ये क्रियाएँ कर्म से संबंधित एक अन्य शब्द (कर्म पूरक) का सहारा लेती हैं। मानना, समझना, आदि ऐसी ही क्रियाएं हैं।

जैसे-

• मोहन नाव चलाता है।

• गोपाल कलम खरीदता है।

• मोहन व्यायाम करता है।

इन उदाहरणों में पहले वाक्य की क्रिया ’चलाता’ है। इस ’चलाता है’ का फल नाव पर पड़ता है। दूसरे वाक्य की क्रिया ’खरीदता’ है। इस ’खरीदता’ क्रिया का फल कलम पर पड़ता है। तीसरे वाक्य की क्रिया ’करता’ है। इस क्रिया का फल ’व्यायाम’ पर पड़ता है। इसी बात को यों भी कहा जा सकता है कि पहले वाक्य में ’नाव’ दूसरे वाक्य में ’कलम’ तथा तीसरे वाक्य में ’व्यायाम’ कर्म हैं। इसलिए इन वाक्यों की क्रियाएँ सकर्मक हैं।

(ख) अकर्मक क्रिया- जिस वाक्य में कर्म नहीं होता उस वाक्य की क्रिया अकर्मक कहलाती है। इस अकर्मक क्रिया की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है-’जिस क्रिया के व्यापार का फल कर्ता पर ही पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।

अकर्मक क्रिया दो प्रकार की होती है-

1. पूर्ण अकर्मक- ’पूर्ण’ से तात्पर्य इतना ही है कि ये अपने में ही पूर्ण होती हैं। इन्हें अपनी पूर्णता व्यक्त करने के लिए किसी पूरक की आवश्यकता नहीं पड़ती; जैसे- सोना, दौड़ना, जाना, आना सभी अकर्मक क्रियाएँ हैं तथा अपना अर्थ व्यक्त करने में स्वत: पूर्ण हैं

जैसे-

• राम गया।

• सीता हँसती है।

• गोविन्द बैठा।

इन उदाहरणों को पहले वाक्य की क्रिया ’गया’ का फल कर्ता राम पर पड़ता है तथा तीसरे वाक्य की ’बैठा’ क्रिया का फल कर्ता गोविन्द पर पड़ता है। इसलिए ये उदाहरण अकर्मक क्रिया के हैं। इस बात को यों भी कहा जा सकता है कि उपर्युक्त वाक्यों में क्रिया के साथ कर्म नहीं है इसलिए ये क्रियाएँ अकर्मक हैं।

2. अपूर्ण अकर्मक- ये क्रियाएँ वाक्य में स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होकर अपना अर्थ पूर्ण रूप में व्यक्त नहीं कर पातीं। इस पूर्णता के लिए इनको कर्ता से संबंध रखने वाले किसी शब्द की आवश्यकता पड़ती है। अपूर्ण क्रिया के अर्थ को पूर्ण करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें पूरक कहते हैं। जैसे होना, बनना, निकलना इसी प्रकार की क्रियाएँ हैं, जो अर्थ की पूर्णता के लिए पूरक का सहारा लेती हैं; जैसे-

• बच्चा बीमार है।

• शीला बेईमान है।

• वह बेईमान निकली।

• वह ईमानदार लगा।

यदि इन वाक्यों में बीमार, ईमानदार, बेईमान आदि पूरक शब्दों का प्रयोग न किया जाए तो वाक्य अधूरा लगता है। पूरक के स्थान पर प्राय: विशेषण तथा संज्ञा का प्रयोग किया जाता है।

अकर्मक और सकर्मक में परिवर्तन निम्न प्रकार से होते हैं-

1. अकर्मक या सकर्मक होना क्रिया की मूल प्रकृति है। अत: इनमें परस्पर परिवर्तन मुख्यत: प्रयोग के स्तर पर होता है, रचना के स्तर पर नहीं; जैसे-

• बच्चा पत्र लिख रहा है -सकर्मक (लिखना)

• बच्चा लिख रहा है - अकर्मक के रूप में प्रयोग

लिखना, पढ़ना, खाना आदि मूलत: सकर्मक क्रियाएँ हैं। वाक्य में उनका प्रयोग कर्म रहित हो सकता है, लेकिन निश्चित अर्थ में वे सकर्मक ही रहेंगी।

2. कुछ धातुएँ मूलत: सकर्मक होती हैं और उनसे अकर्मक धातुएँ भी बनती हैं, क्योंकि चाहे इन क्रियाओं के साथ कर्म का लोप हो, पर कर्म को होना ही चाहिए; जैसे-कपड़े सिल गए। (अकर्मक), दर्जी ने कपड़े सी दिए। (सकर्मक)

3. कुछ क्रियाएँ संदर्भ के अनुसार कभी सकर्मक और कभी अकर्मक के रूप में प्रयुक्त होती है: जैसे-

o पढ़ना- वह पुस्तक पढ़ रहा है- (सकर्मक)

o वह इसी विद्यालय में पढ़ता है (अकर्मक)

o काटना- उसे जूते ने काट लिया। (सकर्मक)

o उसका जूता काटता है। (अकर्मक)

o लजाना राधा अपने रूप से चंद्रमा को भी लजाती है। (सकर्मक)

o उसके सामने चंद्रमा भी लजाता है। (अकर्मक)

4. कुछ क्रियाओं के संबंध में यह कहना कठिन है कि वे मूलत: अकर्मक हैं या सकर्मक; जैसे

§ फटना- पुस्तक फट गई। (सकर्मक)

§ आसमान फट पड़ा। (अकर्मक)

5. अकर्मक से सकर्मक बनाई जाने वाली क्रियाएँ प्राय: प्रथम प्रेरणार्थक होती हैं।

• गिरना- गिलास गिर गया।

• बच्ची ने गिलास गिरा दिया।

• दौड़ना-कुत्ता दौड़ रहा है।

• वह कुत्ते को दौड़ा रहा है।

6. अकर्मक से सकर्मक बनाने के लिए पहले दीर्घस्वर को हस्व कर देते हैं और अंत में ला/आ जोड़ देते हैं; जैसे-

• गिर-गिरा

• नहा-नहला

• भाग-भगा

7. अकर्मक से प्रथम प्रेरणार्थक रूप बनता है और फिर उससे द्वितीय प्रेरणार्थक; जैसे-

• जागना-जगाना-जगवाना

• जाना-भेजना-भिजवाना

8. सकर्मक क्रियाओं के प्रथम तथा द्वितीय प्रेरणार्थक रूप बनते हैं; जैसे-

• काटलना-कटाना-कटवाना

• धोना- धुलाना- धुलवाना

9. कुछ क्रियाओं के प्रेरणार्थक रूप नहीं बनते, वे सकर्मक हों या अकर्मक; जैसे-

§ सकर्मक- पाना, होना, सकना

§ अकर्मक- रहना, आना, लजाना

क्रिया का मूल रूप धातु है।

धातु-क्रिया के सामान्य रूप में से ’ना’ शब्द को हटा देने से जो शब्द बचता है, वही धातु है। पढ़ना, लिखना, बैठना, जाना, आना, खाना आदि क्रिया का सामान्य रूप है। इस रूप में से पीछे वाला ’ना’ हटा देने पर पढ़, लिख, बैठ, जा, आ, कर मिल, आदि शेष रह जाएँगे। अत: ये सब धातु हैं।

धातु के रूप-व्युत्पत्ति के अनुसार धातु के दो रूप हैं-

§ मूल रूप

§ यौगिक रूप

मूल रूप- किसी अन्य शब्द से नहीं बनता है। वह स्वत: ही कार्य व्यापार को सूचित करता है, जैसे- करना, देना, लेना चलना आदि। धातु के यौगिक रूप अन्य शब्दों से बनते हैं। लड़ना से लड़ाना, दौड़ना से दौड़ना।

यौगिक रूप- यौगिक रूप तीन प्रकार से बनते हैं-

धातु में प्रत्यक्ष के संयोग से प्रेरणार्थक रूप में जैसे-

• चलवाता है।

• पढ़वाता है।

दूसरे शब्द-भेदों में प्रत्यक्ष जोड़ने से (इस प्रकार से नाम धातु बनती है।) यह प्राय: संज्ञा और विशेषण के पीछे ’ना’ धातु जोड़ने से बनता है।

जैसे-

§ हथियाना

§ अपनाना।

एक धातु में एक दो संज्ञाएँ अथवा धातु जोड़ने से संयुक्त धातु बनती है,

जैसे-

• खाने लगना

• झगड़ने लगना

• ले लिया

• मार दिया

धातु के अन्य भेद-

(क) सामान्य धातु: मूल धातु में ना प्रत्यय लगाकर बनने वाला रूप सामान्य धातु या सरल धातु कहलाता है; जैसे- सोना, रोना, पढ़ना, बैठना आदि।

(ख) व्युत्पन्न धातु: सामान्य धातुओं में प्रत्यय लगाकर या अन्य किसी प्रकार से परिवर्तन कर जो धातुएँ बनाई जाती हैं, उन्हें व्युत्पन्न धातु कहते हैं। ये प्राय: प्रेरणार्थक सकर्मक धातुएँ होती हैं ; जैसे

सामान्य धातु

व्युत्पन्न धातु

पढ़ना

पढ़ाना, पढ़वाना

काट

काटना, कटवाना

देना

दिलाना, दिलवाना

करना

कराना, करवाना

(ग) नामधातु : संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण में प्रत्यय लगाकर जो धातुएँ बनती हैं, उन्हें नामधातु कहा जाता है; जैसे-

• संज्ञा से-

बात-बतियाना, हाथ-हथियाना, महक-महकना, महकाना

• सर्वनाम से- आप-अपनाना

• विशेषण से- चिकना-चिकनाना, दुहरा-दुहराना, साठ - सठियाना

(घ) सम्मिश्र धातु : संज्ञा, विशेषण अथवा क्रियाविशेषण के साथ जब करना, होना, देना जैसे क्रियापद जुड़ जाते हैं, तो उसे सम्मिश्र धातु कहा जाता है; जैसे-

• संज्ञा से-

• स्मरण- स्मरण करना, कष्ट- कष्ट होना, दान-दान देना, रिश्वत-रिश्वत लेना

• विशेषण से

काला-काला करना, प्यारा-प्यारा लगना, सुन्दर-सुन्दर दिखना, अच्छा- अच्छा लगना

• क्रियाविशेषण से

भीतर-भीतर जाना, बाहर-बाहर करना

(ङ) अनुकरणात्मक धातु : जो धातुएँ व्यक्तियों, प्राणियों या वस्तुओं की ध्वनियों के अनुकरण पर बनाई जाती हैं, उन्हें अनुकरणात्मक धातु कहते हैं; जैसे

• बड़-बड़- बड़बड़ाना

• हिन-हिन- हिनहिनाना

• खट-खट- खटखटाना

• गुन-गुन-गुनगुनाना

• लप-लप-लपलपाना

मुख्य क्रिया तथा सहायक क्रिया

रचना के आधार पर क्रिया के भेद जानने से पूर्व मुख्य क्रिया तथा सहायक क्रिया को समझना आवश्यक है।

मुख्य क्रिया- कर्ता अथवा कर्म के मूल कार्य को मुख्य क्रिया प्रकट करती है। मुख्य क्रिया कोशगत अर्थ या क्रिया पदबंध का मुख्य अर्थ देती है;

जैसे-

• बच्चे गाना गा चुके हैं।

• मैं लिख चुका था।

• वह हँस रही है।

उपर्युक्त सभी वाक्यों में संयुक्त क्रिया पद है किन्तु हँस, गा और लिख ही मूल कार्य को प्रकट कर रहे हैं, अत: ये मुख्य क्रियाएँ हैं। इसके मुख्यत: चार प्रकार हो सकते हैं:-

(क) कार्य द्योतक क्रिया- जिससे कार्य के होने का पता चले; जैसे- मैं पढ़ रहा हूँ।

(ख) घटना द्योतक- जिससे किसी घटना का बोध हो; जैसे- बच्चा गिर गया।

(ग) अस्तित्व द्योतक- जिससे अस्तित्व का बोध हो; जैसे- सारा परिवार छत पर बैठा था।

(घ) संबंध द्योतक अथवा योजक-जो योजक दो वाक्यांशों को जोड़ने का काम करे; जैसे वह लड़का पहले क्रिकेट का खिलाड़ी था, अब नेता है।

सहायक क्रिया-क्रिया पद में मुख्य क्रिया के अतिरिक्त जो अंश बचता है, उसे सहायक क्रिया कहते हैं। सहायक क्रिया से व्याकरणिक अर्थ की सूचना मिलती है; जैसे-

मीना अभी लिख रही है।

§ मैं सो चुका हूँ।

§ वह हिन्दी नहीं बोल पाता।

§ वह चलने लगा है।

उपर्युक्त उदाहरणों में लिख, सो, बोल और चल मुख्य क्रियाएँ हैं, शेष रेखांकित अंश सहायक क्रियाएँ हैं।

इन सहायक क्रियाओं के भेद- काल, पक्ष, वृत्ति, क्रियाकर तथा वाच्य का बोध होता है, अत: इन्हीं के प्रत्यय सहायक क्रिया का निर्माण करते हैं। कुछ विदव्ान रंजक क्रियाओं को भी सहायक क्रिया का ही भेद मानते हैं।

रंजक क्रिया-रंजक क्रियाएं वे होती हें, जो मुख्य क्रिया के अर्थ में विशेषता ला देती हैं और सहायक क्रियाओं के साथ मिलकर या उन्हीं के रूप में प्रयुक्त होती हैं; रंजक क्रियाएँ कहीं मुख्य अर्थ को बढ़ाती हैं तो कहीं घटाती हैं; कहीं विस्तार देती हैं, कहीं संकुचित कर देती हैं, ठीक उसी तरह से जैसे कोई चित्रकार अपने चित्र में रगों के दव्ारा चित्र के किसी अंश को उभारता है, तो किसी को दबाता है। इसी रंजन गुण (रंग भरने का गुण) के कारण यह क्रियाएँ रंजक क्रियाएँ कहलाती हैं।

हिन्दी में प्रमुख रंजक क्रियाए निम्न हैं;

• लेना- स्वबोधक- मैंने खाना खा लिया है।

• देना-परबोधक- उसने काम कर दिया।

• मरना- अप्रियता बोधक- चुल्लू भर पानी में डूब मर

• आना- अतिशयता बोधक- फूलकुमारी को हँसी आ गई।

इन रंजक क्रियाओं की कुछ मुख्या विशेषताएं इस प्रकार हैं-

• रंजक क्रिया के रूप में आने पर ये क्रियाएँ अपने मूल अर्थ का द्योतन नहीं करतीं।

• कुछ रंजक क्रियाओं के नकारात्मक रूप नहीं बन सकते।

• हर रंजक क्रिया का प्रयोग हर मुख्य क्रिया के साथ नहीं किया जा सकता-आ धमकना, जा धमकना तो हो सकता है, पर लिख धमकना, काट धमकना नहीं हो सकता।

अन्य क्रिया

यौगिक क्रिया-मुख्य तथा सहायक क्रिया के अतिरिक्त यौगिक क्रिया का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया जा सकता है। इसमें दो क्रियाएँ एक साथ आती हैं और दोनों मिलकर मुख्य क्रिया का काम करती हैं। पहली क्रिया पूर्णकालिक होती है, पर प्रयोग में कर का लोप हो जाता है;

जैसे -

• वह सामान रख गया।

• मुझे सामान ले जाना है।

• मैंने पत्र लिख भेजा।

संयुक्त क्रिया-संयुक्त क्रिया भी दो धातुओं (क्रियाओं) के योग से बनती है। परन्तु समस्त क्रिया से विपरीत यहाँ क्रिया का मुख्य अर्थ केवल पहली क्रिया के दव्ारा ही बताया जाता है; जैसे चल देना, आ जाना, कर लेना आदि। ये क्रिया रूप क्रमश: संयोग से बने हैं।

संयुक्त क्रिया वाले निम्नलिखि वाक्य हैं-

• मैंने किताब खरीद ली।

• मोहन घर आ गया है।

• मैंने काम कर लिया है

• बादल घिर आए थे।

• क्रिया के कुछ अन्य भेद

1. मूल क्रिया/सरल क्रिया-वे क्रिया रूप जो भाषा में रूढ़ शब्दों की तरह से प्रचलित हैं सरल क्रिया कहे जाते हैं। चूँकि ये क्रियाएँ न तो किसी अन्य क्रिया से व्युत्पन्न हुई हैं और न ही एकाधिक क्रिया रूपों के योग से बनी हैं, अत: इन्हें मूल क्रिया भी कहा है; जैसे आना, जाना, लिखना, खाना, पीना आदि।

सरल क्रियाओं में आने वाली धातुएँ सरल या मूल धातु कही जाती हैं; जैसे-आना, जाना, पढ़ना, लिखना आदि क्रियाओं में आ, जा पढ़ लिखा सरल धातु हैं।

सरल क्रिया के अंतर्गत अकर्मक तथा सकर्मक दोनों ही प्रकार की क्रियाएं आ सकती हैं, जो अकर्मक तथा सकर्मक धातुओं से बनी होती हैं।

2. मिश्र क्रिया/नामिक क्रिया -संयुक्त क्रिया की रचना दो क्रिया धातुओं से मिलकर होती है। परन्तु मिश्र क्रिया में पहला अंश तो संज्ञा, विशेषण या क्रियाविशेषण का होता है तथा दूसरा अंश क्रिया का। ’क्रिया’ वाले अंश को क्रियाकर कहा जाता है।

3. समस्त क्रिया-समस्त धातुएँ दो क्रिया धातुओं के योग से बनती हैं। दोनों क्रियाओं का समास हो जाने के कारण इनको समस्त क्रिया कहा जा है। समस्त क्रिया रूपों में दोनों ही धातुओं (क्रियाओं) का अर्थ बना रहता है; जैसे-

• वह आजकल लिख-पढ़ नहीं रहा।

• मैं अब चल-फिर सकता हूँ।

• वह उठ-बैठ सकती है।

4. नामधातु क्रिया- इन क्रियाओं में आने वाली धातुएँ नामधातु कही जाती हैं। संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण शब्दों में प्रत्यय लगाकर जो धातुएँ बनती हैं वे नामधातु कहलाती हैं। नामधातुओं से बनने वाले क्रिया रूप नामधातु क्रिया कहे जाते हैं; जैसे-

शब्द

नामधातु क्रिया

शरम

शरमाना

संज्ञा शब्द

दुख

दुखना

बात

बतियाना

आलस

अलसाना

विशेषण शब्द

गरम

गरमाना

लँगड़ा

लँगड़ाना

चिकना

चिकनापन

साठ

सठियाना

सर्वनाम शब्द

अपना

अपनाना

दोहरा

दोहराना

5. व्युत्पन्न क्रिया-कुछ क्रिया रूप मूल क्रिया (सरल क्रिया) रूपों से व्युत्पन्न किए जाते हैं। हिन्दी में इस वर्ग में प्रेरणार्थक क्रिया तथा व्युत्पन्न अकर्मक क्रिया आती हैं। इनके विभिन्न रूपों में जो समान अंश पाया जाता है, वही व्युत्पन्न धातु कहलाती है। प्रेरणार्थक क्रिया सकर्मक क्रिया से भिन्न होती है।

6. समापिका तथा असमापिका क्रिया

समापिका क्रियाएँ वे होती हैं, जो वाक्य को समाप्त करती हैं। ये प्राय: वाक्य के अंत में आती हैं। जैसे

• बच्चे खेल रहे हैं।

• वे दौड़ते हैं।

• मैं दिल्ली गया।

• हम शिमला जाएँगे।

इन सभी वाक्यों के अंत में जो क्रिया आ रही हैं, वे सभी ’समापिका क्रिया’ कही जाती हैं। चूंँकि वाक्य इन क्रियाओं पर आकर समाप्त होता है, अत: इन क्रियाओं को समापिका क्रिया कहा जाता है।

असमापिका क्रियाएं- वाक्य को समाप्त नहीं करतीं बल्कि अन्यत्र प्रयुक्त होती हें; जैसे-

• वह चलती हुई गाड़ी से कूद पड़ा।

• आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई

• वह रोते-रोते थक गया है।

• अपने लिखे पत्र को भी नहीं पढ़ सकते।

उपर्युक्त सभी वाक्यों में रेखांकित अंश वाक्य के अंत में प्रयुक्त नहीं हो रहे। इस प्रकार के रूपों को असामापिका क्रिया कहा जाता है।

7. पूर्वकालिक तथा तात्कालिक क्रिया

पूर्वकालिक क्रिया-मुख्य क्रिया से पूर्व होने वाली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है। यह धातु में ’कर’ प्रत्यय लगाकर बनती है।

जैसे-

• राम पढ़कर सो गया।

• उठकर बैठो

• दिव्य खाना खाकर कार्यालय गया।

तात्कालिक क्रिया- भी मुख्य क्रिया से पहले संपन्न होती हैं, पर इसमें और मुख्य क्रिया में समय का अंतर नहीं होता। केवल क्रम का अंतर होता है।

जैसे-

• वह आते ही सो गया।

• बंदूक देखते ही वह बेहोश हो गया।

8. अनुकरणात्मक क्रिया-कुछ क्रिया रूप ऐसी धातुओं से बनते हैं, जो ध्वनियों के अनुकरण पर बनती हैं। ऐसी क्रियाओं को अनुकरणात्मक क्रियाएँ कहा जाता है; जैसे हिन-हिन -हिनहिनाना, टन-टन- टनटनाना आदि

क्रिया का कृदंत रूप-कृंदत शब्द कृत में अंत जोड़कर बना है। संस्कृत में कृत प्रत्यय धातु जुड़कर विशेषण तथा संज्ञा की रचना करते हैं। हिन्दी में कृदंतों का प्रयोग संज्ञा, विशेषण, क्रिया तथा क्रियाविशेषण के रूप में होता है। विशेषत: हिन्दी क्रिया में कृदंतों का महत्वपूर्ण स्थान है:

कृदंत विकारी तथा अविकारी हो सकते हैं अर्थात्‌ इनमें लिंग, वचन के अनुसार परिवर्तन हो भी सकता है और नहीं भी; जैसे-

• राम दौड़ता है -सीता दौड़ती है- परिवर्तित रूप

• मोहन काम करके आया है- मधु काम करके आई है- अपरिर्वतन रूप

1. विकारी कृदंत

(क) वर्तमानकालिक या अपूर्ण कृदंत-इस कृदंत की रचना धातु में न और लिंग-वचन के अनुसार ता/ती/ते लगाकर होती है; जैसे-

बच्चा सोता हैं-बच्ची सोती है-बच्चे सोते हैं।

यह क्रिया रूप वर्तमान काल में हो रही क्रियात्मक विशेषता का ज्ञान कराता है।

(ख) भूतकालिक या पूर्ण कृदंत-इस कृदंत की रचना धातु में लिंग, वचन के प्रत्यय आ/ए/ई जोड़कर होती है; जैसे

• बच्चे ने खाना खाया।

• मैंने पुस्तक पढ़ी।

• माँ ने फल खरीदे।

यह क्रिया रूप क्रिया के पूर्ण होने का बोध कराता है।

(ग) क्रियार्थक- इस कृदंत की रचना धातु में न्‌ तथा लिंग, वचन के प्रत्यय आ,ए,ई लगाकर होती है; जैसे-

§ पत्र लिखना है।

§ उसे जाने के लिए कहो।

§ चिट्‌ठी लिखनी है।

(घ) कर्तृवाचक कृदंत- इस कृदंत की रचना धातु में ने और वाल्‌ तथा लिंग, वचन के प्रत्यय आ,ए,ई लगाकर होती है; जैसे-

§ अब राम भागने वाला है।

§ सब लड़के भागने वाले हैं।

§ लड़कियाँ भागने वाली हैं।

2. अविकारी कृदंत

(क) पूर्वकालिक कृदंत का प्रयोग धातु में कर प्रत्यय लगाकर होता है तथा यह मुख्य क्रिया से पूर्व हुई क्रिया को दर्शाता है; जैसे-

§ वह सोकर पढ़ने बैठा।

§ मैं चलकर आया हूँ।

(ख) वर्तमानकालिक कृदंत के अपूर्ण क्रिया द्योतक रूप तथा तात्कालिक कृदंत रूप और भूतकालिक कृदंत का पूर्ण क्रिया द्योतक रूप भी अविकारी होता है।

• (क) तुम्हें यह काम करते पूरा दिन बीत गया।

अपूर्ण क्रिया दयोतक- धातु में ते जोड़कर।

• (ख) फ़िल्म शुरू होते ही बत्ती चली गई।

तात्कालिक-धातु में ते ही जोड़कर।

• (ग) मुझे दवाई खाए देर नहीं हुई है।

पूर्ण द्योतक -धातु में ए जोड़कर।

उपर्युक्त सभी प्रकार कृत प्रत्यय से बनने वाले क्रिया रूपों के हैं। कृदंत रूपों से संज्ञा, विशेषण तथा क्रियाविशेषण शब्द भी बनते हैं; जैसे

संज्ञा

अपूर्ण कृदंत

सोते को मत जगाओ।

पूर्ण कृदंत

मरे को और न मारो।

क्रियार्थक

घूमना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

कृर्तवाचक

रोने वालों को भले लगते हैं।

विशेषण

अपूर्ण

खिलते फूल भले लगते हैं।

पूर्ण

सोए व्यक्ति को मत जगाओ।

क्रियाविशेषण

अपूर्ण

वह दौड़ता आ रहा है।

पूर्ण

वह दौड़ा आएगा।

व्याकरणिक परिचय में सहायक

क्रिया के काल

1. काल-क्रिया के जिस रूप से उसके होने के समय का बोध होता है तो उसे काल कहते हैं। काल के मुख्त: तीन प्रकार होते हैं-

• वर्तमान काल

• भूतकाल

• भविष्य काल

वर्तमाल काल- जो समय चल रहा है उसे वर्तमान काल कहते हैं।

वर्तमान काल के भेद- वर्तमान काल के चार भेद हैं-

• सामान्य वर्तमान

• अपूर्ण वर्तमान (इसे तात्कालिक वर्तमान भी कहते हैं)

• संदग्धि वर्तमान

• हेतु हेतुमद् वर्तमान।

सामान्य वर्तमान-क्रिया के जिस रूप से वर्तमान में कार्य होना पाया जाए, किन्तु कोई निश्चित समय विदित नहीं, उसे सामान्य वर्तमान काल कहते हैं।

§ गोपाल स्नान करता है।

§ महेश पतंग उड़ाता है।

अपूर्ण वर्तमान-क्रिया के जिस रूप से कार्य के होते रहने का बोध होता है, उसे अपूर्ण वर्तमान काल कहते हैं। अपूर्ण वर्तमान में कार्य का होते रहना ही प्रकट होता है। कार्य समाप्त नहीं होता है।

जैसे-

§ मोहन भोजन कर रहा है।

§ गोपाल भाषण दे रहा है।

संदिग्ध वर्तमान-किया के जिस रूप से वर्तमान काल में काम के होने में संदेह पाया जाए, वहाँ संदिग्ध वर्तमान काल होता है।

जैसे-

§ वह पढ़ता होगा।

§ सोहन आता होगा।

हेतु हेतुमद् वर्तमान-वर्तमान काल की किसी क्रिया के होने पर दूसरी क्रिया का होना निर्भर रहता है, वह हेतु हेतुमद् वर्तमान काल होता है।

जैसे-

• मोहन तार पढ़ता हो तो उसे बुलाओ।

• गोविन्द बिजली लगाना जानता हो तो उससे बातचीत कर लो।

1. भूतकाल- जो समय बीत चुका है उसे भूतकाल कहते हैं।

भूतकाल के निम्नलिखित छ: भेद हैं-

सामान्य भूत- क्रिया के जिस रूप से साधारणत: काम का बीते हुए समय में होना पाया जाए।

जैसे-

वर्षा हुई, लड़के आए।

आसन्न भूत- इससे पहचाना जाता है कि काम भूतकाल में शुरू होकर अभी-अभी समाप्त हुआ।

जैसे-

• उसने लड़ाई की है।

• गाड़ी आई हैं।

पूर्ण भूत- इस रूप से यह पता चलता है कि काम भूतकाल में पूरा हो गया था। जैसे-

§ गाड़ी आई थी।

§ वर्षा हुई थी।

§ लड़के आए थे।

अपूर्ण भूत- इसमें काम के भूतकाल में जारी रहने का पता चलता है।

जैसे-

§ वर्षा आ रही है।

§ लड़के आ रहे थे।

संदिग्ध भूत -इसमें क्रिया के भूतकाल में होने पर संदेह किया जाता है।

जैसे-

§ वर्षा हुई होगी।

§ लड़के आए होंगे।

हेतु हेतुमद् भूत- इसमें भूतकाल की क्रिया किसी कारण पर आधारित होती है। जैसे-

• यदि वह आता, तो मैं जाता।

• यदि वर्षा होती, तो खेती नहीं सूखती।

भविष्यत्‌ काल- जब क्रिया का आने वाले समय में होना पाया जाए तो भविष्यत्‌ काल होता है। जैसे, वह मेला देखने जाएगा। इस वाक्य में यह पता चलता है कि वह न तो मेला देखने गया है और न जा रहा है; बल्कि यह पता चलता है कि वह जायेगा। भविष्यत्‌ का प्रयोग तीन प्रकार से होता है। कहीं पर यह दो प्रकार का बताया गया है; परन्तु प्राय: भविष्यत्‌ तीन प्रकार का होता है-

• सामान्य भविष्यत्‌

• सम्भाव्य भविष्यत्‌

• हेतु हेतुमद् भविष्यत्‌

सामान्य भविष्यत्‌ काल -वहाँ होता है, जहाँ आने वाले समय में साधारण रूप से होने वाली क्रिया का ज्ञान हो।

जैसे-

मैं पढूँगा, तुम जाओगे, वे कथा सुनेंगे, हम चलेंगे।

सम्भाव्य भविष्यत्‌ काल वहाँ होता है, जहाँ शायद या संभव का प्रयोग हो। इस काल मेें क्रिया की संभावना की जाती है।

जैसे -

• शायद वह आज आए।

• संभव है, वे इस गाड़ी से उतरें।

• हो सकता है, वह आज ही चल दें।

• शायद वे न आएँ।

हेतु-हेतुमद् भविष्यत्‌ काल वहाँ होता है, जहाँ कारण और कार्य भविष्य में बताये जाएँ।

जैसे-

• तुम आओगे तो मैं चलूँगा।

• मास्टर जी आएंगे तो पढ़ाई शुरू होगी।

• वर्षा होगी तो अनाज पैदा होगा।

2. क्रिया का पक्ष- क्रिया के जिस रूप से क्रिया की प्रक्रिया गत अवस्था का बोध होता है, उसे क्रिया का पक्ष कहते हैं।

क्रिया पक्ष के प्रकार-

§ आरंभ द्योतक पक्ष- इससे क्रिया के आरंभ की सूचना मिलती है।

जैसे- अब राहुल रोटी खाने लगा है, अशोक नौकरी पर जा रहा है।

§ प्रगति बोधक पक्ष- इससे क्रिया में निरन्तर बढ़ोतरी होने का बोध होता है।

जैसे- बाढ़ का पानी भरता ही चला जा रहा है।

§ सातत्यबोधक पक्ष-इससे क्रिया के वर्तमान में चालू रहने का बोध होता है, जैसे-

विनीता लिख रही है।

अध्यापकजी कक्षांं में पढ़ा रहे हैं।

§ पूर्णता बोधक पक्ष- इससे क्रिया के पूरी तरह समाप्त होने का बोध होता है। जैसे-

मोहन दौड़ चुका है।

मैंने रामायण पढ़ ली है।

§ आवृत्ति मूलक पक्ष- इसमें क्रिया सदा बनी रहती है।

जैसे- राधेश्याम स्कूल जाता हैं।

§ नित्याबोधक पक्ष- इससे क्रिया के नित्य होने का बोध होता है, परन्तु वह पूरी तरह नहीं होती। जैसे-

रमाकांत चिकित्सक था

सूर्य एवं दिशा से निकलता है।

§ अभ्यासद्योतक पक्ष- इससे क्रिया के अभ्यासवश होने का बोध होता है।

जैसे-

सोहन रोज प्रात: उठकर घूमने जाता है।

वह प्राय: गाने सुना करता है।

3. वृत्ति:- सहायक क्रिया के वे अंश जिनसे उस क्रिया व्यापार के प्रति वक्ता की मानसिक अभिवृत्ति या प्रयोजन का पता चले ’वृत्ति’ कहलाते हैं। हिन्दी में वृत्तिवाचक सहायक क्रिया के निम्नलिखित भेद हैं-

1. आज्ञार्थक वृत्ति-इस वृत्ति से आज्ञा, अनुरोध, चेतावनी, निषेध, प्रार्थना आदि का बोध कराया जाता है। इस वृत्ति को व्यक्त करने वाले चिन्ह हैं- शून्य ओ,-इए,-ना तथा इएगा।

इएगा अप्रत्यक्ष रूप से आज्ञा/अनुरोध का भाव प्रकट करते हैं; जैसे-

• जरूर आ जाइएगा।

• मेरा काम अवश्य कर दीजिएगा।

2. इच्छार्थक वृत्ति-इसमें वक्ता की इच्छा, आशा, वरदान, शाप आदि का पता चलता है; जैसे -

• मैं चाहती हूँ कि तुम यह काम जल्दी समाप्त कर लो।

• भगवान सबका भला करे।

3. संभावनार्थक वृत्ति-जिस वृत्ति से किसी क्रिया के भविष्य में होने के बारे में पता चलता है। वहाँ संभावनार्थक वृत्ति कही जाती है। संभावनार्थक वृत्ति से वक्ता कार्य आरंभ होने के प्रति संभावना तो प्रकट करता ही है साथ ही इच्छा, कामना, अनुरोध, अप्रत्यक्ष आदेश का भाव भी व्यक्त कर सकता है। इस वृत्ति के सूचक चिन्ह हैं- ए, -एँ,-ऊँ; जैसे-

• शायद कल बारिश आए।

• हो सकता है गाड़ी न मिले।

• आप घर लौट जाएँ।

• अब मैं किधर जाऊँ।

4. सामर्थ्यसूचक वृत्ति-सामर्थ्य और संभावना को प्रकट करने के लिए जिस वृत्ति का प्रयोग होता है वह सामर्थ्यसूचक वृत्ति कहलाती है। इस वृत्ति के सूचक चिन्ह है सक तथा -पा। जैसे-

• वह मिठाई बना सकती है- सामर्थ्य।

• वह चल नहीं सकता-असामर्थ्य।

• बारिश हो भी सकती है-संभावना

5. बाध्यतासूचक वृत्त- इस वृत्ति से किसी क्रिया या कार्य व्यापार के घटित होने के विषय में ’बाध्यता’ का बोध होता है। हिन्दी में इस बाध्यता को ना सूचकों से दिखाया जाता है जैसे-

• मुझे अब घर जाना है।

• मुझे उनकी हर बात माननी पड़ती है।

• यह काम तो करना ही है।

6. निश्चयार्थ वृत्ति -भविष्य काल को भविष्य वृत्ति या निश्चर्यार्थक वृत्ति माना जाता हैं। जैसे मैं कल आगरा जाऊँगाा।

7. प्रश्नार्थक वृत्ति-जब वक्ता के मन में जिज्ञासा या शंका हो और वह उसका निर्णय पाने के लिए कोई प्रश्न करे; जैसे-

• अब क्या होगा?

• क्या तुम मेरा पत्र दे आओगे?

8. संकेतार्थक वृत्ति- कुछ वाक्यों में दो क्रियाएँ होती हैं तथा दोनों में ही कार्य-कारण-संबंध होता हैं; जैसे -छुट्‌टी होती तो हम घूमने चलते। जिस वत्ति से दो क्रियाओं के कार्य और कारण के संबंध का बोध होता है , से संकेतार्थक वृत्ति कहते हैं; जैसे यदि तुम पढ़ते, तो पास हो जाते।

4. प्रयोग या अन्विति

प्रयोग का संबंध इस बात से है कि वाक्य में क्रिया किस संज्ञा के अनुसार बदल रही है।

प्रयोग के भेद-

• कर्तरि प्रयोग

• कर्मणि प्रयोग

• भावे प्रयोग

क्रिया की रूप-रचना

क्रिया का रूप कर्ता के आधार पर निर्धारित होता है। अत: कर्ता के पुरुष, वचन और लिंग का प्रभाव क्रिया पर पड़ता है।

ध्यान देने योग्य-

• अकर्मक क्रिया को सकर्मक में-प्राय: प्रेरणार्थक के रूप् में और सकर्मक क्रिया को संदर्भ के अनुसार अकर्मक में बदला जा सकता है।

• क्रिया की रूपावली वचन/पुरुष के अनुरूप तथा वचन/लिंग के अनुसार होती है।

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