रस- (Sentiments)

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रस की परिभाषा:- श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है, वहीं काव्य में रस कहलाता है। रस से जिस भाव की अनुभूति होती है वह रस का स्थायी भाव होता है। रस, छंद और अलंकार -काव्य के रचना के आवश्यक अवयव हैं। रस का शाब्दिक अर्थ है- निचौड़।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल- ने स्थायीभाव की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की हैं- ’प्रधान (प्रचलित प्रयोग के अनुसार स्थायी) भाव वही कहा जा सकता है जो रस की अवस्था तक पहुंचे।’ स्पष्ट है कि अनुभाव, व्यभिचारी भाव आदि रसदशा तक नहीं पहुँचते। वे किसी भाव को पुष्ट करते हैं और वही भावपूर्ण रसदशा को प्राप्त करता है। प्रत्येक स्थायी भाव के आधार पर एक-एक रस की कल्पना की गई है। स्मरणीय है कि स्थाई भाव रस होते हैं जिनका परिपाक होने पर रस का उद्भव होता है। इन स्थायी भावों और उनके आधार पर रसों के नाम इस प्रकार हैं-रति, हास, उत्साह, अमर्ष (क्रोध), विस्मय, भय, शोक, जुगुप्सा, निर्वेद। कुछ विदव्ानों ने वात्सल्य दसवें रस की कल्पना की हैं किन्तु वात्सल्य के मूल में संतान के प्रति स्नेह-भाव रस में भी पूज्य बृद्धि युक्त रति भाव की विद्यमानता होती हैं।

प्रमुख रूप से रस के चार प्रकार बताये है- स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव।

स्थायी भाव:- सहृदय के अंत: करण में जो मनोविकार वासना या संस्कार रूप में सदा विद्यमान रहते हैं तथा जिन्हें कोई भी विरोधी या अविरोधी दबा नहीं सकता, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। इनकी संख्या 11 है-रति, हास, शोक, उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद, वात्सल्य और ईश्वर विषयक प्रेम।

विभाव- विभाव का अर्थ है कारण। ये स्थायी भावों का विभावन/उद्धोधन करते हैं, उन्हें आस्वाद योग्य बनाते हैं। ये रस की उत्पत्ति में आधारभूत माने जाते हैं। इसके दो भेद होते हैं आलंबन विभाव और उद्दीपन- भावों का उदगम जिस मुख्य भाव या वस्तु के कारण हो वह काव्य का आलंबन कहा जाता है। इसके अंतर्गत दो विभाव आते है विषय और आश्रय।

§ विषय:- जिस पात्र के प्रति किसी पात्र के भाव जागृत होते हैं वह विषय है। साहित्य शास्त्र में इस विषय को आलंबन विभाव अथवा ’आलंबन’ कहते हैं।

§ आश्रय- जिस पात्र में भाव जागृत होते हैं वह आश्रय कहलाता है।

अनुभाव:- जो भावों का अनुगमन करते हों उन्हें अनुभाव कहते हैं। इसके पांच भेद होते हैं- कायिक, वाचिक, मानसिक, आहार्य, सात्तिवक

§ कायिक- आंगिक चेष्टाएँ कायिक अनुभाव कहलाती हैं। भाव दशा के कारण वचन में आये परविर्तन को वाचिक अनुभाव कहते हैं। आंतरिक प्रमोद आदि भाव को मानसिक अनुभव कहते है। बनावटी वेष को आहार्य कहते हैं। शरीर के स्वाभाविक अंग विकार को सात्तिवक अनुभाव कहते हैं। सात्तिवक अनुभावों की संख्या आठ हैं- स्तंभ, स्वेद रोमांच, स्वर भंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय।

व्यभिचार भाव- इसे संचारी भाव के नाम से भी जाना जाता है। जो भाव विशेष रूप से स्थायी भाव की पुष्टि के लिए तत्पर या अभिमुख रहते हैं और स्थायी भाव के अंतर्गत आविर्भूत और तिरोहित होते दिखाई देते हैं, वे संचारी या व्यभिचारी भाव कहलाते हैं। जैसे लहरें समुद्र में पैदा होती हैं और उसी में विलीन हो जाती है। इसके प्रकार निम्न हैं निर्वेद, आवेग, दैन्य, श्रम, मद, जड़ता, औग्रय (उग्रता), मोह, विबोध, स्वप्न, अपस्मार, गर्व, मरण, अलसता, अमर्ष, निद्रा, अवहित्था, औत्सुक्य, उन्माद, शंका, स्मृति, मति, व्याधि, सन्त्रास, लज्जा, हर्ष, असूया, विषद, धृति, चपलता, ग्लानि, चित्र और वितर्क।

रस का नाम

स्थायीभाव

श्रृंगार

रति

हास्य

हास

वीर

उत्साह

रोद्र

क्रोध

भयानक

भय

अदभूत

विस्मय/आश्चर्य

करुण

शोक

विभत्स

जुगुत्सा/घृणा

शांत

निर्वेद

इनके अलावा दो रसों की चर्चा और होती है

वात्सत्य संतान विषयक रति

भक्ति भगवद विषयक रति

रसो की परिभाषा व उदाहरण:-

1. श्रृंगार दो प्रकार के होते हैं पहला संयोग श्रृंगार, दूसरा वियोग या विप्रलंभ श्रृंगार

संयोग श्रृंगार- जहाँ नायक-नायिका की संयोग अवस्था का वर्णन किया जाए जैसे-

एक पल मेरे प्रिया के दृग पलक।

थे उठे ऊपर, सहज नीवे गिरे।

चपलता ने इस विकंपित पुलक से,

दृढ़ किया मानो प्रणय संबंध था।।

यहाँ नायक-नायिका की पलकें एक-दूसरे की ओर एक साथ ही उठती हैं और एक साथ ही सहज भाव से नीचे गिरती हैं। वे दोनों पुलकित हो उठते हैं। इस प्रकार उनका प्रणय संबंध दृढ़ होता हैं। यहाँ नायक-नायिका आलंबन विभाव हैं, उनका सौंदर्य-उद्दीपन है। पलकों का उठना-गिरना अनुभाव और लज्जा-संचारी भाव है। इन सबके संयोग से रति भाव श्रृंगार रस के रूप में परिणत हो जाता है।

विप्रलम्भ या वियोग श्रृंगार-जहाँ नायक-नायिका की वियोग अवस्था का वर्णन किया जाए। जैसे-

मैं जिन अलिंद पर खड़ी थी सखी एक रात

रिमझिम बूँदें पड़ती थीं घटा छाई थी।

गमक रही थी केतकी की गंध चारों और

झिल्ली झनकार यही मेरे मन भाई थी।

करने लगी मैं अनुकरण स्व नूपुरों से

चंचला थी चमकी घनाली घहराई थी।

चौंक देखा मैंने चुप कोने में खड़े थे प्रिय,

माई मुखलज्जा उसी छाती में छिपाई थी।।

यहाँ उर्मिला आलंबन है। बूँदें, घटा, फूल की गंध, झिल्लियों की झनकार उद्दीपन है। छाती में मुँह छिपाना अनुभाव है। लज्जा, स्मृति, हर्ष संचारी भाव हैं इनसे पुष्ट होकर रति भाव श्रृंगार रस में परिणत होकर व्यक्त होता है।

2. हास’ रस अंग -विकार, वेशभूषा एवं वाक्‌-वैचित्र्य से उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता ’हास’ कहलाता है। हास्य रस का स्थायी भाव हास या हँसी है। विदूषक या मसखरा आलंबन विभाव है। उसकी विचित्र वेशभूषा, विचित्र चेष्टाएं उद्दीपन विभाव हैं। हँसना, ठहाका लगाना, आँखे बंद करना व हँसी के कारण अ आंखों में पानी आना अनुभाव है। हर्ष, चपलता, आलस्य आदि संचारी भाव हैं।

हास्य के भेद- स्मित (मुस्कान), हसित, विहसित, अवहसित, अपहसित। जैसे

विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महाबिन नारि दुखारे।

गौतमतीय तरी ’तुलसी’ सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे।

हूवैहैं सिला सब चंद्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे।

कीन्हीं भली रघुनायक जू करुना करि कानन को पगुधारे।

श्रीराम के वनगमन के अवसर पर विन्ध्य पर्वत के वन प्रदेश में तप करने वाले तपस्वी बहुत प्रसन्न हैं क्योंकि राम के कोमल चरणों के स्पर्श से अनेक पत्थर की शिलाएँ सुंदरी स्त्रियाँ बन जाएँगी। ये तपस्वी लोग वैराग्य के हेतु तप कर रहे हैं किन्तु स्त्रियों के बिना दु:खी हैं। उससे उनके व्यक्तित्व में असंगति आ जाती है। यही हास्य का संचार करती है।

यहाँ राम आलंबन विभाव हैं, गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार उद्दीपन विभाव है। मुनि लोगों की कथा सुनना अनुभाव है एवं हर्ष, उत्सुकता, चंचलता आदि संचारी भाव हें। इन सबके संयोग से हास्य रस का परिपाक होता है।

3. वीर रस (उत्साह)-समाज में वीरों एवं वीरता के कार्यो को प्रतिष्ठा दी जाती है। काव्य में वीर रस का विशेष महत्व है। उत्साह स्थायी भाव विभावों, अनुभावों और संचारी भावों में पुष्ट होकर वीर रस में परिणत होता है उसे वीर रस कहते हैं यह चार प्रकार के होते हैं- युद्धवीर, दानवीर, दयावीर और धर्मवीर। इसमें युद्धवीर को विशेष स्थान दिया जाता है। युद्ध वीर रस में उत्साह स्थायीभाव है। शत्रु या अत्याचारी आलबंन विभाव है। उसका आक्रमण, अनाचार, या ललकार उद्दीपन विभाव है। वीर पुरुष का अंग फड़कना, अस्त्र-शस्त्र ग्रहण करना अनुभाव। अभिमान पूर्ण वचन, मूँछो पर ताव देना, अमर्ष आदि संचारी भाव हैं। जैसे-

हे सारथे! हैं द्रोण क्या, देवेंन्द्र, भी आकर अड़ें,

है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह भेदन कर लड़े।

मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुुकुमार मत जानो मुझे,

यमराज से भी युद्ध को प्रस्तुत सदा मानो मुझे।

यहाँ द्रोणाचार्य दव्ारा रचित चक्रव्यूह का भेदन करने के लिए अभिमन्यू की उत्सुकता दिखाई गई है। द्रोण तथा कौरव सेना आलंबन, अभिमन्यू आश्रय। अभिमन्यू के वीरतापूर्ण वचन अनुभाव उसकी उग्रता संचारीभाव हैं।

उत्साह रस- पराक्रम, दानशीलता एवं धर्म व कर्तव्य के प्रतिनिष्ठा से जो मानसिक उमंग का भाव उत्पन्न होता है, उसे उत्साह कहते हैं।

4. अमर्ष (रौद्र रस)- अपने अथवा अपने इष्टजन के प्रति हुए अपमान या अपराध से जो रोष का भाव उत्पन्न होता है। उसे ’अमर्ष’ या क्रोध कहते हैं। रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। शत्रु या विरोधी पक्ष दव्ारा अपनी अनुचित चेष्टाओं या अनिष्ट कार्य से देश, जाति, समाज अथवा धर्म का अपकार करने से उसके प्रतिशोध में जो क्रोध का भाव पैदा होता है, उसके कारण पुष्ट होने वाला भाव रौद्र रस के रूप में अभिव्यक्त होता हैं जैसे

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से चलने लगे।

सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे।।

संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।

करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े।।

इस पद में अभिमन्यू के बाद अर्जुन के क्रोध को व्यक्त किया है। यहाँ कौरवों की प्रसन्नता अर्जुन के क्रोध का आलंबन है। कृष्ण के वचन, अर्जुन के क्रोध भाव के उद्दीपन आश्रय, अर्जुन की घोषणा हथेली मलना, मुँह लाल होना अनुभाव हैं तथा आवेग, उग्रता, गर्व, अमर्ष आदि संचारी भाव हैं।

5. भय (भयानक) रस- भय भयानक रस का स्थायीभाव है। सिंह, चीता आदि हिंसक वन्य पशु, अजगर, सशक्त शत्रु, भयंकर दृश्य एवं स्थान आलंबन विभाव हैं। सिंह आदि की गर्जना, सर्प की फुंकार, निर्जनता उद्दीपन विभाव हैं। कंप, स्वेद चीख आदि अनुभाव हैं। व्यग्रता, चिंता, मूर्च्छा दीनता आदि संचारी भाव होते हैं।

भयंकर वस्तु या घटना को देखकर जो भाव हृदय में पैदा होता है, वह ’भय’ स्थायी भाव कहलाता है। भय नामक स्थायी भाव विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव से पुष्ट होकर भयानक रस में परिणत हो जाता है। जैसे

एक ओर अजगरसिंह लखि एक ओर मृगराय।

विकल बटोही बीच ही, पर्‌यो मूरछा खाय।।

उपर्युक्त दोहे में एक भयप्रद परिस्थिति की कल्पना की गई है। एक ओर अजगर और दूसरी ओर सिंह का देखकर व्याकुल होकर यात्री बीच में मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। यहाँ यात्री आश्रय है। अजगर और सिंह आलंबन है। अजगर की फुँकार और सिंह की गर्जना तथा उनकी भयंकर चेष्टाएँ उद्दीपन हैं। यात्री का कांपना व मूर्छा अनुभाव हैं, व्याकुलता चिंता, डर आदि संचारी भाव हैं, इन सबसे पुष्ट होकर भय स्थायी भाव भयानक रस में परिणत हुआ है।

6. विस्मय या आश्चर्य रस- विचित्र वस्तु या अद्भुत दृश्य व व्यक्ति को देखकर हृदय में जागृत होने वाला भाव ’विस्मय’ स्थायीभाव होता हैं।

आश्चर्य जनक वस्तु, अलौकिक घटना, असमान्य दृश्य आलंबन विभाव हैं। विचित्रता, असाधारण वस्तु या व्यक्ति की महिमा का वर्णन, उद्दीपन विभाव हैं। मुंह बनाना, दांतों तले अंगुली दबाना, रोमांच, स्वेद, स्वरभंग आदि अनुभाव हैं। जड़ता, आवेग, चिंता, शंका, विर्तक आदि संचारी भाव हैं। जैसे-

अखिल भूवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखी मातु।

चकित भाई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु।।

यशोदा श्रीकृष्ण के मुख में चर अचर समस्त भूवन को देखकर विस्मृत हो जाती हैं। उनके मुख से वचन नहीं निकल पाते, कंठ रुँध जाता है और हृदय गद्गद् हो जाता है। तथा नेत्र विस्फारित हो जाते हैं।

यहाँ श्रीकृष्ण का मुख आलंबन है, यशोदा आश्रय है, मुख के भीतर चर-अचर प्राणी तथा अन्य दृश्य उद्दीपन, नेत्र विस्फाारित होना, गद्गद् वचन होना अनुभाव एवं भय, दैन्य आदि संचारी भाव हैं। इससे पुष्ट होकर विस्मय का भाव अद्भुत रस में परिणत होता है।

7. शोक रस-इष्ट के विनाश तथा अनिष्ट-प्राप्ति से उत्पन्न होने वाला ’दु:ख’ करुण रस का स्थायी भाव माना जाता है। इस्ट वस्तु की हानि, प्रिय व्यक्ति की मृत्यु या चिर वियोग, अनिष्ट की प्राप्ति, अर्थ हानि से जहाँ शोक भाव की पुष्टि होती हें, वहाँ करुण रस होता हैं।

प्रिय व्यक्ति की मृत्यु या चिर वियोग करुण रस का आलंबन विभाव हैं, शमशान, दाहकर्म, प्रिय-गुण-स्मरण चित्र-दर्शन आदि उद्दीपन विभाव हैं। रोना, सिसकना, हा-हा करना, आंसू, बहाना अनुभाव हैं तथा विषाद, रुद्रल,ग्लानि , बेहोशी, आदि संचारी भाव हैं। जैसे

जो भुरि भाग्य भरी विदित थी अनुपमेय सुहासनी,

हे हृदय बल्लभ! हूं वही अब मैं यहाँ हत भागनी।

जो साथनी होकर तुम्हारी थी अतिव सनाथनी।

हे अब उसी मुझसी जगत में ओर कौन अनाथनी।।

यहाँ उत्तरा (अभिमन्यू -पत्नी) आश्रय है, अभिमन्यू का शव आलंबन है। उत्तरा दव्ारा पती की शूर -वीरता का स्मरण किया जाना उद्दीपन हैं, उसका चित्कार करना अनुभाव हैं तथा स्मृति, दैन्य, चिंता आदि संचारी भाव हैं। इनसे पुष्ट या प्रगाढ़ होकर शोक का भाव करुण रस के रूप में व्यंजित हुआ है।

काव्य में करुण रस को विशेष महत्व प्राप्त हैं। दु:ख या शोक की संवदेना बड़ी गहरी और तीव्र होती है। इससे सहानुभूति का भाव विस्तृत होता है। करुण रस मनुष्य को भोग भाव से विरक्त कर साधना भाव की ओर प्रेरित करता है। भवभूति कवि ने तो ’एको रस: करुण एव’ कहकर उसे अदव्तीय माना हैं।

8. जुगुप्सा (वीभत्स) (घृणा) रस- किसी गंदी वस्तु (खून, मवाद, कीचड़, हडडी, राल को) देखकर उत्पन्न होने वाली ग्लानि को जुगुप्सा कहते हैं। इसका स्थायी भाव जुगुप्सा या घृणा है। श्मशान, चर्बी, लाश आदि इसके आलंबन विभाव होते हैंं। कीड़ों का बिलबिलाना, मक्खियों का भिनभिनाना, गिद्ध-कौओं दव्ारा मांस को नोचा जाना उद्दीपन विभाव हैं। नाके सिकोड़ना, मुंह पर कपड़ा रखना बार-बार थूकना, घृणा से मुंह फेर लेना आदि अनुभाव हैं। जी मितलाना, ग्लानि, जड़ता वैवर्ण्य आदि संचारी भाव है। जैसे

सिर पर बैठ्‌यों, काग, आंख दोउ खात निकाल।

खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत।।

गीध जांघ को खोदि-खोदि के मांस उभारत।

स्वान अंगुरिन काटि-काटि के खात विदारत।।

यहाँ शमशान का दृश्य प्रस्तुत किया गया है। शमशान का दृश्य, मुर्दे, मांस, चर्बी आदि आलंबन है। राजा हरिश्चंद्र इस दृश्य का देख रहे हैं, अत: वे आश्रय हैं। गिद्ध सियार, कुत्तों दव्ारा मांस का नोचा जाना और खाना उद्दीपन है। मोह, ग्लानि संचारी भाव हैं। राजा के हृदय का घृणा भाव स्थाई भाव है। इनके संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

9. निर्वेद (शांत रस) (वैराग्य)- साधुजन की संगति तथा शास्त्रादि के अध्ययन से उत्पन्न होने वाले ज्ञान से हृदय में विरक्ति (वैराग्य) की भावना उत्पन्न होती है जिसे निर्वेद कहते हैं। शम अथवा निर्वेद नामक स्थायी भाव का उत्कर्ष होने पर शांत रस का परिपाक होता है। निर्वेद (शम) (सांसारिक वस्तुओ के प्रति वैराग्य) स्थायी भाव जब तत्वज्ञान, गुरूपदेश या लोकहित आत्म चिंतन से प्रेरित होता है तो मनुष्य की भावनाओं में अलौकिक शांति का संचार होता हैं।

शांत रस का स्थायीभाव निर्वेद (विरक्ति) है। लौकिक, या सांसारिक व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के प्रति उदासीनता विरक्ति, परमार्थ-चिंतन इसके आलंबन विभाव हैं। साधु-संतों का उपदेश, महात्माओं का दर्शन, देवालय व तीर्थस्थलों की यात्रा, शास्त्रों का श्रवण-मनन, माया के बंधन के प्रति अरुचि उद्दीपन विभाव हैं। आंसू बहाना, रोमांच गृहत्याग कर वन-गमन आदि अनुभाव हैं। मति, स्मरण, उद्वेग, धृति, हर्ष आदि संचारी भाव हैं। जैसे-

सुत वनितादि जानि स्वारथ रत न करू नेह सबही ते।

अंतहिं तोहि तजेंगे पामर! तू न तजे अबही ते।

अब नाथहिं अनुराग जागु जड़, त्यागु दुरासा जीते।

बुझे न काम अगिनि ’तुलसी’ कहूँ विषय भोग बहुघीते।।

प्रस्तुत पद में गोस्वामी तुलसीदास सांसारिक मनुष्यों को समझाते हैं कि संसार के प्राणी पुत्र -पत्नी आदि स्वार्थ भाव से पूर्ण है अत: किसी से भी स्नेह या प्रेम करना उचित नहीं। अंत में सभी तुम्हे त्याग देंगे अत: इनका मोह त्याग देना चाहिए। काम की अगनी विषय भोग से शांत नहीं होती अत: हे मूर्ख! हृदय से दुराशा की भावना त्याग कर परमात्मा के प्रति अनुराग उत्पन्न कर। यहाँ सांसारिक सुख एवं स्त्रीि -पुत्र आदि संबंधी आलंबन हैं। संबंधित जन आश्रय है। सांसारिक सुखों को त्यागने की बात कहना अनुभाव है। दव्तीय, मति, विमर्श आदि संचारी भाव हैं। इनसे परिपुष्ट होकर निर्वेद नामक स्थायी भाव शांत रस परिणत होता हैं।

10. वात्सल्य रस- शिशुओं, नन्ने मुन्नों का मुस्काराना, किलकारना, तुतलाना, घुटनों के बल चलना, जिद करना, रूठना आदि चेष्टाएं स्वाभावत: ही मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करती है इनसे मनुष्य के हृदय में स्नेह नामक स्थायी भाव जागृत होता है। इससे वास्सल्य रस की निष्पत्ति होती है। प्राचीन आचार्यो ने वात्सल्य रस की पृथक सत्ता को स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार स्नेह, भक्ति तथा वात्सल्य रति के विशेष रूप हैं। अत: श्रृंगार में ही इनका अंतर भाव किया गया। किन्तु बालक के प्रति माता पिता का स्नेह और पति पत्नी का प्रेम एक दूसरे से भिन्न है, इन्हें एक मानना युक्ति -संगत नहीं। सूरदास वात्सल्य का अनूठा वर्णन करके उसका महत्व प्रतिपादित किया है। जैसे-

सोभित कर नवनीत लिए।

घुटुरुनि चलत रेनुतन मंडित,

मुख दधि-लेप किए।

यहाँ स्नेह स्थायीभाव है। नहें श्याम आलंबन विभाव हैं। हाथ में मक्खन लिए हुए कृष्ण का मनोहारी रूप उद्दीपन विभाव है। घुटनों के बल चलना, कृष्ण का धूलि-धूसरित शरीर अनुभाव है। हर्ष का आवेग संचारी भाव हैं।