संज्ञा के विकाराक तत्व (लिंग वचन कारक)

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लिंग की परिभाषा- शब्द के जिस रूप से यह पता चले के वह पुरुष जाति का है या स्त्री जाति का, उसे व्याकरण में ’लिंग’ कहते हैं।

हिन्दी में दो लिंग हैं- पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। जैसे घोड़ा दौड़ता है/घोड़ी दौड़ती है, काला घोड़ा/काली घोड़ी, कुत्ता-कुतिया, लड़का-लड़की आदि।

अप्राणीवाचक संज्ञा शब्दों के लिंग की पहचान उनके साथ लगने वाली क्रिया और विशेषण से ही हो पाती है; जैसे- कुर्सी टूट गई है।

बस्ता फट गया है।

उभयलिंगी शब्द-कुछ शब्द ऐसे भी होते हैं जिनका प्रयोग दोनों लिंगों (पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग) में हो सकता है। इन शब्दों में लिंग परिवर्तन नहीं होता; जैसे प्रधानमंत्री, मंत्री, डॉक्टर (चिकित्सक), मंत्री आदि।

शब्दों का लिंग परिवर्तन

हिन्दी में ज्यादातर पुल्लिंग शब्दों से स्त्रीलिंग शब्द बनाए जाते हैं। इस दृष्टि से मूल शब्द पुल्लिंग हैं तथा इनमें प्रत्यय जोड़कर स्त्रीलिंग शब्द बनते हैं। इस प्रकार से बने स्त्रीलिंग शब्द अपने पुल्लिंग शब्दों के साथ जोड़ों के रूप में देखे जा सकते हैं। कुछ पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्दों का अंतर छोटे-बड़े आकार के आधार पर होता है। जैसे नाला-नाली, चींटा-चींटी। रिश्ते में पति-पत्नी, दादा-दादी, मामा-मामी आदि।

नोट (ध्यान देने योग्य)-लिंग का निर्णय शब्द और वाक्य के स्तर पर होता है।