वाच्य

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वाच्य की परिभाषा-क्रिया के जिस रूपांतर से यह जाना जाए कि क्रिया दव्ारा किए गए विधान (कही गई बात) का विषय कर्ता है, कर्म है या भाव है उसे ’वाच्य’ कहते हैं।

हिन्दी में वाच्य तीन होते हैं

• कर्तृवाच्य

• कर्मवाच्य

• भाववाच्य

कर्तृवाच्य- जिस वाक्य बिन्दु ’कर्ता’ है, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं; अर्थात वे वाक्य जो सकर्मक क्रिया के अकर्तृवाच्यीकरण के कारण बनते हैं कर्मवाच्य कहे जाते हैं: जैसे-

• रोटी आराम से खाई जाती है।

• कविता से गाना गाया जाएगा।

• उससे व्यायाम किया जा रहा है।

कर्मवाच्य के प्रयोग स्थल-

निम्नलिखित स्थलों पर कर्मवाच्य वाक्यों का प्रयोग होता है;

• जहाँ कर्ता अज्ञात हो; जैसे -पत्र भेजा गया।

• जब आपके बिना चाहे कोई कर्म अचानक आ गया हो; जैसे-काँच का गिलास टूट गया।

• जहाँ कर्ता को प्रकट न करना हो; जैसे-डाकुओं का पता लगाया जा रहा है।

भाववाच्य-जहाँ वाच्य बिन्दु न तो कर्ता हो, न कर्म बल्कि क्रिया का भाव ही मुख्य हो, उसे भाववाच्य कहा जाता है; अर्थात भाववाच्य के वाक्यों में अकर्मक क्रिया होती है: जैसे-

• बच्चो दव्ारा सोया जाता है।

• अब चला जाए।

• मुझसे बैठा नहीं जाता।

भाववाच्य के प्रयोग स्थल

भाववाच्य का प्रयोग प्राय: असमर्थता विवशता प्रकट करने के लिए ’नही’ ंके साथ किया जाता है; जैसे-

1. अब चला नहीं जाता।

2. अब तो पहचाना भी नहीं जाता।

जहाँ ’नहीं’ का प्रयोग नहीं होता वहाँ मूल कर्ता सामान्य होता है; जैसे-

1. अब चला जाए।

2. चलो ऊपर सोया जाए।

वाच्य संबंधी कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु-

कृर्तवाच्य में सकर्मक-अकर्मक दोनों ही प्रकार की क्रियाओं का प्रयोग होता है।

कर्मवाच्य में क्रिया सदैव सकर्मक होती है।

भाववाच्य की क्रिया सदा अन्य पुरुष, पुल्ल्लिंग, एकवचन में रहती है।